बात उस दौर की है जब पद्मश्री से सम्मानित मशहूर बांसुरी वादक पंडित रोनू मजूमदार मुंबई के महबूब स्टूडियो में संघर्ष कर रहे थे। वहां एक साथी कलाकार ने उनसे कहा, 'अगर इस इंडस्ट्री में पहचान बनानी है, तो तुम्हें अपना गुरु बदलना पड़ेगा।' लेकिन, रोनू ने गुरु बदलने को 'बेईमानी' माना। समय ने ऐसा पलटा खाया कि बाद में एक कार्यक्रम में उसी कलाकार ने रोनू से माफी मांगी। नई पीढ़ी में शास्त्रीय संगीत को लेकर रुचि, सोशल मीडिया से ट्रेनिंग और पुरानी परंपराओं में बदलाव जैसे मुद्दों पर उन्होंने बात की दीक्षा गौड़ से। पेश हैं प्रमुख अंश :शास्त्रीय संगीत और भारतीय संस्कृति के भविष्य को लेकर आप आज की नई पीढ़ी को किस नजरिए से देखते हैं?युवाओं में थोड़ी जल्दबाजी जरूर है, लेकिन वे हमारी संस्कृति को बचाकर रखेंगे- यह मेरा दावा है। कुछ लोग Gen Z के नाम पर संस्कृति को गलत तरीके से पेश करते हैं, जैसा पिछले दिनों दिल्ली में देखने को मिला। लेकिन, वह असली Gen Z नहीं है, उसमें कुछ असामाजिक तत्व घुस आए थे। नई पीढ़ी भी भारतीय संस्कृति, शास्त्रीय संगीत और अपनी विरासत को बहुत ऊंचा दर्जा देती है, इनका सम्मान करती है।
आपने कहा कि युवाओं में जल्दबाजी दिखती है, तो क्या सलाह देंगे?
मेरी सलाह है कि सफलता के पीछे भागने के बजाय अपने 'विषय' (ज्ञान) को मजबूत करने पर ध्यान दें। आज बहुत-से लोग जल्दी पहचान बनाना चाहते हैं, लेकिन अगर आपकी नींव मजबूत नहीं है तो यह पहचान पानी के बुलबुले की तरह होगी। आज है, कल नहीं और फिर कोई और। आपको अपनी साधना, शैली और अपने विषय पर भरोसा रखना होगा।
गुरु-शिष्य परंपरा में किस तरह के बदलाव देख रहे हैं और वे कितने सही हैं?
आज गुरु-शिष्य परंपरा तो है, लेकिन असली 'गुरुकुल' खत्म हो चुके हैं जहां संगीत के साथ अकादमिक पढ़ाई भी हो सके। टेक्नॉलजी के कारण बच्चों का अटेंशन स्पैन घट रहा है। वे यूट्यूब से अब एक मिनट की रील्स देखने लगे हैं। इतने कम समय में संगीत की गहराई को साधना संभव नहीं है, और यह बदलाव चिंताजनक है।
महबूब स्टूडियो में आपको गुरु बदलने की सलाह दी गई थी, वह किस्सा क्या था और आपने उसका सामना कैसे किया?
शुरुआती दिनों में जब मैं संघर्ष कर रहा था, तब महबूब स्टूडियो में एक वरिष्ठ साइड-रिदम प्लेयर ने मुझसे कहा था कि इस इंडस्ट्री में स्थापित होने के लिए तुम्हें अपनी तालीम और गुरु बदलना पड़ेगा। यह बात मेरे आत्मसम्मान और निष्ठा पर चोट थी। मैंने साफ कह दिया कि अपनी पहचान बनाने के लिए गुरु बदलना बेईमानी है और मुझे अपनी विरासत व बजाने की शैली पर पूरा यकीन है। मैंने किसी की परवाह किए बिना अपनी साधना जारी रखी। बरसों बाद, जब मैं एक बड़े राष्ट्रीय मंच पर प्रस्तुति दे रहा था, तो वही कलाकार श्रोताओं के बीच मौजूद थे। मेरा वादन खत्म होने के बाद वह मंच के पीछे आए, भावुक होकर मेरे पैर पकड़ लिए और स्वीकार किया कि मेरी निष्ठा और काम ने उन्हें गलत साबित कर दिया।
सोशल मीडिया के जरिए कम उम्र में संगीत सिखाने का चलन बढ़ा है, आपकी नजर में यह कितना सही है?
बहुत से लोग इसे महज एक बिजनेस बना रहे हैं। यूट्यूब से संगीत सीखना एक सीमा तक ही संभव है, क्योंकि कोई भी कलाकार स्क्रीन के जरिए बच्चे का हाथ पकड़कर यह नहीं बता सकता कि 'यहां गलती है', 'यह मींड ऐसे नहीं, ऐसे निकलेगा' या 'इसे इस तरह बजाना है'। संगीत की ये छोटी बारीकियां यूट्यूब या महज किसी स्क्रीन के जरिये नहीं सीखी जा सकतीं। ऑनलाइन फॉलो-अप तो ठीक है, जैसे मैंने बच्चे को कोई चीज सिखाई और फिर ऑनलाइन पूछा कि 'कल क्या रियाज किया, सुनाओ'। लेकिन, चार सेशन में से कम से कम एक सेशन वन-टू-वन होना बेहद जरूरी है। बिना प्रत्यक्ष मार्गदर्शन और बारीकियों को सुधारे संगीत की सच्ची साधना संभव नहीं है।
बांसुरी के क्षेत्र में करियर बनाने की इच्छा रखने वाले युवाओं को क्या सलाह देना चाहेंगे?
बांसुरी शुरुआत में आसानी से बज जाती है, इसलिए बहुत भीड़ हो गई है, पर अच्छे वादक आज भी गिने-चुने ही हैं। आजकल यूट्यूब और फेसबुक पर पैसे देकर प्रमोशन कराया जा सकता है। ऐसे में फिल्मी गाने बजाकर खुद को शिक्षक बताने वाले बहुत लोग हैं, जिनसे बच्चों को सावधान रहना चाहिए। बांसुरी की बारीकियां सीखने के लिए अच्छे और अनुभवी गुरु का मार्गदर्शन जरूरी है। सिर्फ सोशल मीडिया पर लोकप्रियता देखकर किसी को अपना गुरु न बनाएं। पहले उसकी साधना, अनुभव और संगीत की समझ को देखें। संगीत में लंबे समय तक टिकना है तो सही तालीम और लगातार रियाज पर ध्यान देना होगा।