इस्लामाबाद: पाकिस्तान के वरिष्ठ नेता और एमएनए (सांसद) मौलाना फजलुर रहमान ने असीम मुनीर के सैन्य नेतृत्व की कड़ी आलोचना की है। उन्होंने कहा कि देश को अपने परिवार की प्रोपर्टी की तरह समझना और पूरी सत्ता को अपने हाथों में सीमित करने के नतीजे बहुत खराब हो सकते हैं। पाकिस्तान में विपक्ष के अहम चेहरे मौलाना रहमान ने सीधेतौर पर मुनीर को चेतावनी देते हुए कहा कि इस तरह के बर्ताव से 1971 (पाकिस्तान के टूटने) जैसे नतीजे हो सकते हैं।

मौलाना डीजल कहे जाने वाले जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम (एफ) के प्रमुख फजलुर रहमान ने मौजूदा हालात की तुलना 1971 में ढाका में पाकिस्तानी आर्मी की हार से की है, जिसके नतीजे में पाकिस्तान के दो टुकड़े हुए और बांग्लादेश नाम से नया देश बना। उन्होंने आर्मी चीफ के इशारे पर चल रही मौजूदा सरकार पर प्रांतीय स्वायत्तता और लोकतांत्रिक अधिकारों को कमजोर करने का आरोप लगाया।

ढाका में हजारों पाकिस्तानी सैनिकों के आत्मसमर्पण करने से एक दिन पहले याह्या खान ने कहा था कि हम आखिर तक लड़ेंगे। अगले ही दिन सरेंडर हो गया।

मौलाना फजलुर रहमान

'पाकिस्तान किसी की निजी संपत्ति नहीं'

पाकिस्तान सरकार ने खैबर पख्तूनख्वा (केपी) में आपातकाल लगाते हुए पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) के नेतृत्व वाली सरकार को रद्द कर दिया है। इस फैसले पर विपक्ष में कड़ी नाराजगी है। फजलुर रहमान ने शक्तिशाली सैन्य प्रतिष्ठान और सत्ताधारी गठबंधन पर आरोप लगाया है कि वे पाकिस्तान को अपनी निजी जागीर की तरह समझ रहे हैं, जिसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

JUI-F प्रमुख ने तर्क दिया कि राजनीतिक दलों और सरकारी संस्थानों के बीच सहयोग एकतरफा नहीं हो सकता। केपी के मामले में दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थता करने की कोशिश की थी। मुझे लगता था कि सरकार की ओर से आपातकाल की घोषणा करने से पहले कोई समाधान निकाला जा सकता था। दूसरे प्रांतों को भी सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है तो फिर केपी में ही ऐसे कदम क्यों उठाए जा रहे हैं।
'लोगों को जानवर ना समझें'

फजलुर रहमान ने सरकार की आम पाकिस्तानियों के साथ खराब बर्ताव और विरोध को बलपूर्वक दबाने की आलोचना की है। उन्होंने सत्ताधारी गठबंधन पर आरोप लगाया कि वे जनता की चिंताओं को नजरअंदाज कर रहे हैं और असहमति को दबाने के लिए सरकारी ताकत का इस्तेमाल कर रहे हैं।

रहमान ने कहा, 'आप लोगों के साथ जानवरों जैसा बर्ताव नहीं कर सकते और उन्हें अपनी मर्जी की कोई भी चीज खाने के लिए नहीं दे सकते हैं। सत्ता में बैठे लोगों को जनता के प्रति जवाबदेह होना चाहिए, ना कि उनको यह उम्मीद करनी चाहिए कि लोग बिना किसी सवाल के उनकी हर बात मान लें।'