
छत्तीसगढ़ में अगला विधानसभा चुनाव अभी करीब ढाई साल दूर है। चुनावी तारीखों का ऐलान तो दूर, कांग्रेस के पास अभी संगठन को मजबूत करने और सत्ता में वापसी की तैयारी के लिए लंबा वक्त है। इसके बावजूद पार्टी के भीतर मुख्यमंत्री पद के संभावित चेहरों की चर्चा शुरू हो गई है।
इसकी शुरुआत प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज के एक बयान से हुई, जिसमें उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, नेता प्रतिपक्ष चरणदास महंत, पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव और पूर्व मंत्री ताम्रध्वज साहू को मुख्यमंत्री बनने योग्य बताया।
खास बात यह है कि ये चारों नाम नए नहीं हैं। 2018 में जब कांग्रेस 15 साल बाद सत्ता में लौटी थी, तब भी मुख्यमंत्री पद के लिए यही 4 नाम सामने थे। उस समय राहुल गांधी के साथ हुई बैठकों में भूपेश बघेल, टीएस सिंहदेव, ताम्रध्वज साहू और चरणदास महंत चार प्रमुख दावेदार थे। आखिर में भूपेश बघेल को मुख्यमंत्री बनाया गया।
अब करीब 8 साल बाद वही चार नाम फिर चर्चा में हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि 2018 के बाद इन चारों की राजनीतिक यात्रा अलग-अलग दिशा में गई है। कोई मुख्यमंत्री बन चुका है, कोई नेता प्रतिपक्ष है, कोई डिप्टी सीएम रह चुका है और कोई सरकार में गृह मंत्री की जिम्मेदारी संभाल चुका है।
ऐसे में सवाल यह नहीं है कि इन चारों का नाम क्यों आया, बल्कि यह है कि अगर पार्टी भविष्य में इनमें से किसी को मुख्यमंत्री के चेहरे के तौर पर देखती है तो उसके पीछे उनके पास कौन-कौन से आधार हैं?
चारों में सबसे बड़ा तथ्य भूपेश बघेल के साथ यह है कि वह 5 साल छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। 2018 में कांग्रेस ने 90 में से 68 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी और बघेल मुख्यमंत्री बने थे।
इससे पहले वे प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर संगठन को संभाल चुके थे। 2013 के झीरम हमले के बाद कांग्रेस के बड़े नेताओं के मारे जाने से पार्टी को बड़ा झटका लगा था। इसके बाद बघेल ने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में संगठन को संभाला और 2018 की चुनावी जीत तक पार्टी का नेतृत्व किया।
यही उनका सबसे बड़ा राजनीतिक आधार है। वह सिर्फ दावेदार नहीं रहे, बल्कि मुख्यमंत्री के तौर पर पांच साल सरकार चला चुके हैं। इसके अलावा पाटन सीट से उनका लंबा चुनावी आधार है। 2023 में भी वे पाटन से विधानसभा चुनाव जीते। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक उन्हें 95,438 वोट मिले थे और उन्होंने भाजपा के विजय बघेल को हराया था।
हालांकि 2024 लोकसभा चुनाव में राजनांदगांव से उन्हें हार मिली। भाजपा के संतोष पांडेय ने उन्हें 44,411 वोट से हराया। यानी मुख्यमंत्री पद के लिए उनके नाम के साथ पिछली सरकार और संगठन चलाने का अनुभव जुड़ा है, लेकिन हाल के लोकसभा चुनाव का नतीजा भी उनके मौजूदा राजनीतिक सफर का हिस्सा है।
इसलिए बघेल के मामले में चर्चा का आधार साफ है, पहले मुख्यमंत्री रह चुके हैं, सरकार चलाने का अनुभव है और अभी भी विधानसभा की राजनीति में सक्रिय हैं।
चरणदास महंत की स्थिति बाकी तीनों से अलग है। वे इस समय विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं। 2023 के चुनाव में उन्होंने सक्ती विधानसभा सीट से कांग्रेस के टिकट पर 81,519 वोट लेकर जीत दर्ज की। इसके बाद कांग्रेस ने उन्हें विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाया।
महंत का राजनीतिक अनुभव विधानसभा तक सीमित नहीं है। वे मध्यप्रदेश के समय भी विधायक और मंत्री रहे, लोकसभा सांसद रहे और केंद्र में मंत्री की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। 2019 से 2023 तक वे छत्तीसगढ़ विधानसभा के अध्यक्ष भी रहे। यानी उनके पास राज्य की सरकार और विधानसभा दोनों के कामकाज का लंबा अनुभव है।
इस समय उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक भूमिका विपक्ष के नेता की है। विधानसभा में सरकार के खिलाफ कांग्रेस की रणनीति और मुद्दों को सामने रखने की जिम्मेदारी उनके पास है। जुलाई 2026 के विधानसभा सत्र में कांग्रेस की ओर से लाए गए अविश्वास प्रस्ताव की अगुआई भी उन्होंने की थी।
यानी अगर महंत के नाम को देखें तो उनके पक्ष में तीन अलग-अलग अनुभव एक साथ दिखते हैं- लंबा विधानसभा अनुभव, केंद्र की राजनीति का अनुभव और मौजूदा नेता प्रतिपक्ष की भूमिका।
टीएस सिंहदेव: सरकार में नंबर 2 पर रह चुके, लेकिन चुनाव हारने का सवाल भी
टीएस सिंहदेव का नाम 2018 में भी मुख्यमंत्री पद की दौड़ में था और उस समय वे नेता प्रतिपक्ष थे। 2018 के चुनाव से पहले कांग्रेस के घोषणापत्र और चुनावी अभियान में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। मुख्यमंत्री पद की चर्चा में वे भूपेश बघेल के प्रमुख दावेदारों में थे।
2018 में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद सिंहदेव को स्वास्थ्य समेत कई अहम विभाग मिले। जून 2023 में चुनाव से कुछ महीने पहले उन्हें उपमुख्यमंत्री बनाया गया। यानी उनके पास सरकार के भीतर मंत्री और डिप्टी सीएम के रूप में काम करने का अनुभव है।
लेकिन सिंहदेव के राजनीतिक सफर में 2023 का चुनाव एक बड़ा मोड़ रहा। अंबिकापुर, जिसे वे लंबे समय से प्रतिनिधित्व करते रहे थे, वहां उन्हें भाजपा के राजेश अग्रवाल से हार मिली। आधिकारिक आंकड़ों में दोनों के बीच अंतर 94 वोट का रहा। 2018 में इसी सीट पर सिंहदेव ने 39,624 वोट से जीत दर्ज की थी।
सिंहदेव ने हाल में ढाई-ढाई साल के फॉर्मूले की चर्चा से हुए नुकसान का भी जिक्र किया है और यह संभावना जताई कि 2023 में उनकी हार के कारणों में यह चर्चा भी एक वजह रही हो सकती है। यानी इस बार उनके नाम के साथ सरकार में अनुभव और लंबे राजनीतिक कद के साथ 2023 की चुनावी हार का तथ्य भी मौजूद है।
ताम्रध्वज साहू: संगठन के बाहर नहीं, लेकिन चुनावी राजनीति में पिछली स्थिति अलग
ताम्रध्वज साहू भी 2018 में मुख्यमंत्री पद के चार प्रमुख दावेदारों में शामिल थे। उस समय वे लोकसभा सांसद थे और पार्टी के बड़े ओबीसी चेहरों में गिने जाते थे। 2018 के बाद कांग्रेस सरकार में उन्हें गृह जैसे महत्वपूर्ण विभाग की जिम्मेदारी मिली।
साहू के पास सांसद और राज्य सरकार में मंत्री दोनों का अनुभव है। लेकिन उनकी मौजूदा राजनीतिक स्थिति 2018 से अलग है। 2023 में वे दुर्ग ग्रामीण सीट से विधानसभा चुनाव हार गए। भाजपा के ललित चंद्राकर को 87,175 वोट मिले, जबकि साहू को 70,533 वोट मिले। अंतर 16,642 वोट का रहा।
इसके बाद 2024 लोकसभा चुनाव में उन्होंने महासमुंद सीट से कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा, लेकिन भाजपा की रूपकुमारी चौधरी से हार गए।
इसलिए साहू के नाम की चर्चा में एक तरफ सांसद, मंत्री और गृह विभाग संभालने का अनुभव है, तो दूसरी तरफ 2023 और 2024 के लगातार दो चुनावी नतीजे भी हैं। यही वजह है कि उनका प्रोफाइल बाकी तीनों से थोड़ा अलग दिखाई देता है।
2018 जैसे ही चार नाम, लेकिन चारों की स्थिति बदल गई
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प हिस्सा यही है कि कांग्रेस के पास मुख्यमंत्री पद की चर्चा के लिए नए नाम सामने नहीं आए, बल्कि 2018 के वही चार नाम फिर चर्चा में हैं।
2018 में चारों एक ही जगह खड़े थे कांग्रेस को सरकार बनानी थी और हाईकमान को मुख्यमंत्री चुनना था। आज स्थिति अलग है। बघेल मुख्यमंत्री रह चुके हैं, महंत नेता प्रतिपक्ष हैं, सिंहदेव डिप्टी सीएम रह चुके हैं और साहू गृह मंत्री रह चुके हैं।
यानी 2018 में चारों के पास मुख्यमंत्री बनने की संभावना का आधार मुख्य रूप से उनका संगठन, जनाधार और पार्टी में वरिष्ठता था। अब उनके साथ सरकार चलाने का अनुभव, विधानसभा में भूमिका, मंत्री पद और चुनावी प्रदर्शन जैसे नए अध्याय जुड़ चुके हैं।
चारों के बीच क्षेत्र और सामाजिक प्रतिनिधित्व का अंतर
चारों नेताओं को सिर्फ उनके पदों से देखने पर तस्वीर पूरी नहीं होती। उनका राजनीतिक आधार भी अलग-अलग इलाकों से आता है। भूपेश बघेल दुर्ग संभाग के पाटन से आते हैं। चरणदास महंत सक्ती और जांजगीर-चांपा क्षेत्र की राजनीति में लंबे समय से सक्रिय हैं।
टीएस सिंहदेव का राजनीतिक आधार सरगुजा और अंबिकापुर रहा है। वहीं ताम्रध्वज साहू दुर्ग क्षेत्र की राजनीति से जुड़े बड़े नेताओं में रहे हैं। 2018 में भी कांग्रेस के सामने यही सवाल था कि सरकार का नेतृत्व किस सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरण के साथ किया जाए। उस समय चारों नेताओं के नाम अलग-अलग कारणों से चर्चा में थे। आखिरकार पार्टी ने बघेल को चुना।
अब 2028 से पहले फिर वही नाम सामने आने का मतलब यह भी है कि कांग्रेस के भीतर इन चारों की राजनीतिक उपयोगिता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। हालांकि इस बार पार्टी के सामने सिर्फ 2018 जैसी परिस्थितियां नहीं होंगी। 2023 का चुनाव परिणाम, 2024 का लोकसभा चुनाव और मौजूदा संगठनात्मक स्थिति भी फैसले का हिस्सा होगी।
इस बार सबसे बड़ा सवाल सिर्फ चेहरा नहीं, चुनाव जिताने की क्षमता का भी होगा
अभी चुनाव में ढाई साल का समय है, इसलिए इसे मुख्यमंत्री पद की वास्तविक दौड़ कहना जल्दबाजी होगी। प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज ने चार नाम गिनाने के बाद फैसला हाईकमान पर छोड़कर अपने बयान को भी संतुलित किया है। खुद उनका नाम इस सूची में नहीं था।
लेकिन बयान ने एक बात साफ कर दी है कांग्रेस में मुख्यमंत्री पद के संभावित चेहरों की चर्चा चुनाव से काफी पहले शुरू हो गई है। चारों के पास अपनी-अपनी वजहें हैं, लेकिन चारों की मौजूदा राजनीतिक स्थिति भी एक जैसी नहीं है।
बघेल के पास मुख्यमंत्री पद का अनुभव और विधानसभा में जीत है। महंत के पास नेता प्रतिपक्ष की मौजूदा भूमिका और लंबा संसदीय अनुभव है। सिंहदेव के पास मंत्री और डिप्टी सीएम का अनुभव है, लेकिन 2023 की विधानसभा हार भी उनके रिकॉर्ड का हिस्सा है। साहू के पास सांसद और गृह मंत्री का अनुभव है, लेकिन 2023 और 2024 के चुनाव परिणाम उनके सामने अलग चुनौती रखते हैं।
इसलिए 2028 की तस्वीर अभी तय नहीं है। अभी जो सामने आया है, वह इतना जरूर है कि 2018 में जिस चार नामों के बीच कांग्रेस को मुख्यमंत्री चुनना पड़ा था, 2026 में भी पार्टी की चर्चा उन्हीं चार चेहरों के आसपास लौट आई है। फर्क यह है कि इस बार चारों अपने साथ पिछले आठ साल का अलग-अलग राजनीतिक रिकॉर्ड लेकर खड़े हैं।
50 अंडर 50 से लेकर CM चयन तक, हाईकमान का फॉर्मूला क्या रहा?
कांग्रेस ने 2022 के उदयपुर चिंतन शिविर में संगठन में नई पीढ़ी को आगे बढ़ाने का फॉर्मूला तय किया था। इसके तहत CWC से लेकर प्रदेश, जिला, ब्लॉक और मंडल स्तर तक 50% पद 50 साल से कम उम्र के नेताओं को जिम्मेदारी देने की बात कही गई थी।
2023 के रायपुर अधिवेशन में भी इसे लागू करने पर जोर दिया गया। इसमें CWC से लेकर प्रदेश, जिला, ब्लॉक और मंडल स्तर तक के संगठनात्मक पद शामिल थे। हालांकि 50 अंडर 50 मुख्यमंत्री चुनने का सीधा नियम नहीं है।
बाद के राज्यों में हाईकमान के फैसलों में उम्र के साथ विधायक दल की राय, संगठन में भूमिका, चुनावी प्रदर्शन और क्षेत्रीय-सामाजिक समीकरण भी सामने आए। हिमाचल में 2022 में सुखविंदर सिंह सुक्खू के साथ प्रतिभा सिंह और मुकेश अग्निहोत्री के नाम भी चर्चा में थे। विधायकों की बैठक और हाईकमान की बातचीत के बाद सुक्खू को CM बनाया गया।
कर्नाटक में 2023 में मुख्यमंत्री पद के लिए सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के बीच फैसला करना था। यानी यहां भी पार्टी के सामने सिर्फ उम्र का सवाल नहीं था, बल्कि लंबे राजनीतिक अनुभव, संगठन में भूमिका, चुनावी प्रदर्शन और दोनों नेताओं के समर्थन का संतुलन था।
यही वजह है कि छत्तीसगढ़ में 2028 से पहले सामने आए चार नामों को भी सिर्फ इस आधार पर नहीं देखा जा सकता कि इनमें कौन 50 साल से कम या ज्यादा है।
कांग्रेस का घोषित '50 अंडर 50' फॉर्मूला संगठन में नई पीढ़ी को आगे बढ़ाने के लिए था, लेकिन मुख्यमंत्री चुनने में हाईकमान के सामने चुनावी जीत, विधायक दल का समर्थन, संगठन में पकड़, क्षेत्रीय और सामाजिक समीकरण तथा सरकार चलाने की क्षमता जैसे कई दूसरे पहलू भी रहे हैं।
दिलचस्प यह भी है कि 2026 तक कांग्रेस अपने '50 अंडर 50' लक्ष्य को पूरी तरह लागू नहीं कर पाई है। CWC और उससे जुड़े 85 नेताओं में केवल 12 यानी करीब 14 फीसदी ही 50 साल से कम उम्र के थे।
इस लिहाज से 2028 के चुनाव में अगर कांग्रेस सत्ता में लौटती है तो मुख्यमंत्री के चेहरे को लेकर एक दिलचस्प स्थिति बनेगी। एक तरफ 2018 के चार पुराने चेहरे हैं, जिनके पास सरकार और संगठन चलाने का अनुभव है।
दूसरी तरफ कांग्रेस का अपना घोषित फॉर्मूला नई पीढ़ी को आगे लाने का है। ऐसे में फैसला सिर्फ इस बात पर नहीं टिकेगा कि कौन पहले मुख्यमंत्री पद का दावेदार रह चुका है, बल्कि हाईकमान के सामने यह भी सवाल होगा कि पार्टी भविष्य के लिए किस पीढ़ी और किस चेहरे पर दांव लगाना चाहती है।