बाराबंकी: सु्प्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के बाराबंकी स्थित टोल प्लाजा पर वकीलों के तोड़फोड़ और हिंसा की घटना पर नाराजगी जताई है। कोर्ट ने कहा कि वकालत एक सम्मानित पेशा है और ऐसी घटनाओं से छवि धूमिल होती है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया को दोषी वकीलों के खिलाफ उचित अनुशासनात्मक कार्रवाई का निर्देश दिया।आपको बता दें कि इस साल 14 जनवरी को हैदरगढ़ तहसील के टोल प्लाजा पर एक कार के गुजरने को लेकर हुए विवाद के दौरान प्रतापगढ़ निवासी अधिवक्ता रत्नेश शुक्ला पर कथित तौर पर पांच लोगों ने हमला किया था। इस घटना के बाद विरोध में बड़ी संख्या में अधिवक्ता लखनऊ-सुल्तानपुर हाइवे स्थित टोल प्लाजा पर जमा हो गए और जबरन परिचालन ठप कर दिया।
केस लड़ने वाले वकील के दफ्तर में लगाई थी आग
बाद में, स्थानीय बार एसोसिएशन के भीतर एक प्रस्ताव पारित किया गया और प्रसारित किया गया कि कोई भी वकील आरोपी व्यक्तियों की ओर से पेश नहीं होगा। प्रस्ताव पारित होने के बावजूद, अधिवक्ता मनोज शुक्ला ने आरोपी की ओर से जमानत याचिका दायर की। इसके बाद बार एसोसिएशन के सदस्यों ने वकील से अभद्र व्यवहार किया और उनके कार्यालय के फर्नीचर में आग लगा दी गई।आरोपियों ने सुप्रीम कोर्ट में लगाई गुहार
इसके बाद आरोपियों ने सुप्रीम कोर्ट में जमानत के लिए याचिका दायर की, क्योंकि निचली अदालत में उनका प्रतिनिधित्व करने के लिए कोई वकील तैयार नहीं था। उन्होंने मुकदमे को स्थानांतरित करने का भी अनुरोध किया।
सुप्रीम कोर्ट ने निंदा की
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने बाराबंकी बार एसोसिएशन के सदस्यों की भूमिका की निंदा की, जिन्होंने याचिकाकर्ता की ओर से जमानत याचिका दायर करने वाले वकील के कार्यालय में तोड़फोड़ की।
'हिंसा को उचित नहीं ठहराया जा सकता'
पीठ ने कहा- 'वकीलों के बीच भाईचारे की भावना को हम समझ सकते हैं, लेकिन किसी भी तरह से हिंसा और अराजकता के कृत्यों को उचित नहीं ठहराया जा सकता। अनुशासनात्मक निकाय, अर्थात भारतीय विधिज्ञ परिषद से अपेक्षा की जाती है कि वह इस संबंध में उचित कदम उठाए।'