SC या राजपूत क्या है प्रतिमा बागरी की जाति? 110 साल पुराने रिकॉर्ड से मंत्री ने रखा पक्ष

Updated on 07-07-2026 08:17 PM
भोपाल। मध्य प्रदेश की नगरीय विकास एवं आवास राज्य मंत्री प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाण पत्र को लेकर चल रहे विवाद ने नया मोड़ ले लिया है। सोमवार को मंत्रालय में अनुसूचित जाति मामलों की राज्य स्तरीय छानबीन समिति के समक्ष मामले की सुनवाई हुई, जिसमें मंत्री प्रतिमा बागरी और शिकायतकर्ता कांग्रेस नेता प्रदीप अहिरवार ने अपने-अपने पक्ष में दस्तावेज और तर्क प्रस्तुत किए। फिलहाल समिति ने कोई अंतिम फैसला नहीं सुनाया है।

प्रतिमा बागरी ने स्वयं को अनुसूचित जाति वर्ग का बता रिकॉर्ड किए पेश

करीब एक घंटे चली सुनवाई के दौरान प्रतिमा बागरी ने स्वयं को अनुसूचित जाति वर्ग का बताते हुए कई दस्तावेज समिति के समक्ष रखे। उन्होंने 110 वर्ष पुराने खसरा-खतौनी रिकॉर्ड की प्रतियां पेश करते हुए दावा किया कि इनमें कहीं भी बागरी समुदाय को राजपूत या उसकी किसी उपजाति के रूप में दर्ज नहीं किया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि उनके पक्ष में न्यायालय से जुड़े अभिलेख और अन्य सरकारी रिकॉर्ड भी उपलब्ध हैं।

दादा जुगल किशोर बागरी भी रैगांव विधानसभा सीट से विधायक रह चुके हैं

मंत्री ने यह तर्क भी दिया कि बागरी समाज के नेताओं को वर्षों से अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित विधानसभा सीटों से चुनाव लड़ाया जाता रहा है। उन्होंने कहा कि केवल भाजपा ही नहीं, बल्कि कांग्रेस ने भी गुनौर जैसी एससी आरक्षित सीट से महेंद्र बागरी और काशी बागरी को उम्मीदवार बनाया था। उन्होंने अपने परिवार का उदाहरण देते हुए बताया कि उनके दादा जुगल किशोर बागरी भी सतना जिले की रैगांव विधानसभा सीट से विधायक रह चुके हैं।

मंत्री बनने के बाद जाति प्रमाण पत्र पर सवाल उठाए जाने लगे

सुनवाई के बाद मीडिया से बातचीत में प्रतिमा बागरी ने आरोप लगाया कि उनके खिलाफ राजनीतिक साजिश रची जा रही है। उन्होंने कहा कि विधायक बनने तक किसी को कोई आपत्ति नहीं थी, लेकिन मंत्री बनने के बाद उनके जाति प्रमाण पत्र पर सवाल उठाए जाने लगे। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कुछ लोग उन्हें बदनाम करने और दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

अहिरवार ने वर्ष 1916 के ब्रिटिशकालीन गजट और 1950 के गजट पेश किए

वहीं, शिकायतकर्ता और कांग्रेस अनुसूचित जाति विभाग के प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार ने समिति के समक्ष करीब 430 पृष्ठों के दस्तावेज सौंपे। उन्होंने वर्ष 1916 के ब्रिटिशकालीन गजट, 1950 के भारत सरकार के गजट और अन्य आधिकारिक अभिलेखों का हवाला देते हुए दावा किया कि बागरी समुदाय मूल रूप से सामान्य वर्ग का हिस्सा रहा है। उनका कहना है कि वर्ष 1950 में जारी अनुसूचित जातियों की सूची में तत्कालीन विंध्य प्रदेश के सतना क्षेत्र के बागरी समुदाय का नाम शामिल नहीं था।

उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के सरकारी अभिलेखों का भी उल्लेख किया

अहिरवार ने उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के सरकारी अभिलेखों का भी उल्लेख करते हुए दावा किया कि वहां बागरी समुदाय को राजपूत वर्ग से जोड़ा गया है। उनके समर्थन में सतना और पन्ना जिलों के अनुसूचित जाति समुदाय के 50 से अधिक लोग भी दस्तावेजों के साथ समिति के समक्ष उपस्थित हुए।
प्रमुख सचिव, अनुसूचित जाति कल्याण विभाग गुलशन बामरा की अध्यक्षता वाली राज्य स्तरीय छानबीन समिति ने दोनों पक्षों की दलीलें और दस्तावेज सुनने के बाद फिलहाल कोई निर्णय नहीं दिया है। समिति अब प्रस्तुत साक्ष्यों और रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद आगे की कार्रवाई करेगी।


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